गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ज्यादा जोगी मठ उजाड़

ज्यादा जोगी मठ उजाड़
लगे अपने ही तंबू उखाड़
बनाये जब तिल का ताड़
एक दूसरे पर उछाले कीचड़
हाथ से हाथ का हो बिगाड़
त्रिफला न ठीक करे मरोड़
हरि प्रसाद का न हो जुगाड़
आका से मिले धोबी पछाड़
दुश्मन को पहुंचाएं तिहाड़
निकली चुहिया जब खोदा पहाड़
क्यों न बंद करे जनता किवाड़
कमल का तो अपना है कीचड़
अब जनता देगी चहेरा बिगाड़
(दिनेश ठक्कर "बापा")


2 टिप्‍पणियां:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…



☆★☆★☆


ज्यादा जोगी मठ उजाड़
वाऽहऽऽ…!
पहली पंक्ति ने ही सब कुछ कह दिया...
साधुवाद

आपकी लेखनी से सदैव संदर श्रेष्ठ सार्थक सृजन होता रहे...

मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…




आदरणीय दिनेश ठक्कर "बापा"जी
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